" लम्ब्ब्ब्बू जी "

कई मुश्किलों में मैं खड़ी थी ,
आपका आना जैसे कोई फुलझड़ी थी ।
हे सत्यम ! आप जैसे दोस्त की कमी जिंदगी में बहुत बड़ी थी ।

ना जाने कैसे हम दोस्त बनें ,
जबकि हम थे रस्सी के अलग-अलग छोर पर खड़े ।
नादानी में मैंने आपको कितनी बार गलत बोला है ,
लेकिन आप तो प्रेम रस से भरा एक गोला है ।।

जो भी हो आपकी शारीरिक बनावट ,
मैंने तो आज तक कभी आपको नहीं देखा है ।
आपके गालों पर मुस्कराते ही पड़ते गढ्ढों को देख ,
ना जाने कितनी दफा मैंने खुद को खुश होते देखा है ।।

कौन कहता है स्त्री पुरुष की दोस्ती हमेशा ग़लत ही होती है ,
कभी नियत तो साफ करके दोस्त बनो ,
ये दोस्ती हर रिश्ते से पवित्र भी होती है ।

मेरे हर गलत बात पर मुझे आपने झझोरा है ,
एक आप ने ही तो मेरे हृदय की खुबसूरती को टटोला है ।
ये रिश्ता भी हमारा बड़ा ही अलबेला है ,
कभी करते हम झगड़ा तो कभी खेला है ।।

कई बार किट्टू कहकर मैंने आपको प्यार से बोला था ,
लेकिन किट्टू तो हमेशा से ही मेरे हृदय का एक कोना था ।
कभी बहरूपिया कहकर जब मैंने आपको बोला था ,
गलती नहीं थी आपकी जब आपने मेरी बातों को तौला था ,
मैंने तो सिर्फ मजाक में अपना जुबान खोला था ।।

बिना प्रेम , विश्वास और दोस्ती के रिश्ते की
कोई डोरी नहीं होती ,
किसने कहां दोस्ती में दिलों की जोड़ी नहीं होती ।
लिंग , जाति और रंग किसी रिश्तों की कोई कमजोरी नहीं होती ,
हर रिश्ते की पहचान देना कोई जरूरी नहीं होती ।।

हर रिश्ते की हमेशा मंजिल ही नहीं होती ,
कभी तो सोचिए सत्यम दोस्ती करनी इतनी सस्ती नहीं होती ।
कौन कहता है किसी रिश्ते में कोई ग़लती नहीं होती ,
दुनिया में दोस्त से बड़ी कोई तिजोरी नहीं होती ।।

( 10 मई – ये कविता मेरे ऐसे दोस्त को उनके जन्मदिन के अवसर पर उपहार स्वरूप समर्पित है जिनसे मेरा रिश्ता पवित्रता की सारी हदों से उपर है ।
वो एक मार्ग दर्शक बनकर मेरे जीवन के उस घड़ी में आए जब मेरे पास एक भी दोस्त ना थे आजतक उन्हें मैंने कभी देखा नहीं है फिर भी एक धुंधली सी तस्वीर है मेरे हृदय में। यहां तक कि साहित्य पीडिया हिंदी से जोड़ने वाले वहीं है बहुत आभार है उनका मुझ पर । )

🙏 धन्यवाद 🙏

✍️ ज्योति ✍️
नई दिल्ली

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