कविता · Reading time: 1 minute

लब पर तेरा नाम है

लब पर तेरा नाम है
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यह बस मेरा काम है
लब पर तेरा नाम है

पल पल हर क्षण पर
छाया तेरा नाम है

सुबह,दोपहर से शाम
दिन रात यही काम है

तेरी मेरी मोहब्बत का
कोई भी नही दाम है

सदियों से चली आई
प्रेम डगर बदनाम है

उल्फत की सीमा नहीं
नजर आई सरेआम है

बंदिशों में कब बंधी
तरमीम खुलेआम है

मनसीरत इख़्तलाती
इश्तिहा बनी आम है
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सुखविंद्र सिंह मनसीरत
खेड़ी राओ वाली (कैथल)

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Author
सुखविंद्र सिंह मनसीरत कार्यरत ःःअंग्रेजी प्रवक्ता, हरियाणा शिक्षा विभाग शैक्षिक योग्यता ःःःःM.A.English,B.Ed व्यवसाय ःःअध्ययन अध्यापन अध्यापक शौक ःःकविता लिखना,पढना भाषा ःःहिंदी अंग्रेजी पंजाबी हिन्दी साहित्यपीडिया साईट पर प्रथम रहना प्रतिलिपि…
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