.
Skip to content

+++ लजीज पकवान +++

दिनेश एल०

दिनेश एल० "जैहिंद"

कविता

November 12, 2017

लजीज पकवान
// दिनेश एल० “जैहिंद”

हँसता-खेलता मेरा परिवार ।
अपना है यही छोटा संसार ।।
आठ लोगों की छोटी गृहस्थी ।
पूरे गाँव में कुछ रखती हस्ती ।।

माँ को गर्म आलू-पराठे भाते ।
बापू तो आज भी सत्तू खाते ।।
ताला कभी मुँह पे ना होता ।
पेट इनका कभी नहीं सोता ।।

भूख के मारे सभी छटपटाते ।
कहने वाले भुक्खड़ कह जाते ।।
बड़ा बेटा मेरा पेटू कहलाता ।
उसको सिर्फ़ गुलगुल्ला भाता ।।

कभी-कभी वह नाच लगाता ।
तब तो वह खीर-पूड़ी खाता ।।
शनिवार हो या हो रविवार ।
छोटी बेटी खाती है अचार ।।

जब कभी भी वह रूठ जाती ।
फिरतो वो छोले-भटूरे खाती ।।
पत्नी रखती भोजन का शौक ।
दाल बनाती खूब छौंक-छौंक ।।

आज भी चोखा व भात खाती ।
बडे-मन से बेसन-कढ़ी बनाती ।।
जरा भी शर्म उसको ना आती ।
कढ़ी -पराठे फिर खूब दबाती ।।

अपना हाल यार बड़ा बेहाल ।
हम भी खाते खूब रोटी-दाल ।।
हमको प्याज के पकौड़े भाते ।
गैस का मारा हम नहीं खाते ।।

==============
दिनेश एल० “जैहिंद”
11. 11. 2017

Author
दिनेश एल०
मैं (दिनेश एल० "जैहिंद") ग्राम- जैथर, डाक - मशरक, जिला- छपरा (बिहार) का निवासी हूँ | मेरी शिक्षा-दीक्षा पश्चिम बंगाल में हुई है | विद्यार्थी-जीवन से ही साहित्य में रूचि होने के कारण आगे चलकर साहित्य-लेखन काे अपने जीवन का... Read more
Recommended Posts
कभी कोई कभी कोई
जलाता है बुझाता है कभी कोई कभी कोई। मेरी हस्ती मिटाता है कभी कोई कभी कोई।।1 बुरा चाहा नहीं मैनें जहाँ में तो किसी का... Read more
कभी लेखनी कहती है ।
कभी कभी कागज कहता है , कभी लेखनी खुद कहती है आज तुम्हें कुछ लिखना हैं । नही आ रहा तो सिखना है । कभी... Read more
कभी भला तो कभी बुरा लगता है
कभी भला तो कभी बुरा लगता है वो सारी दुनिया से जुदा लगता है मुद्दत हुई उसका फोन आया न कोई खत आया मेरा महबूब... Read more
मुक्तक
कभी तो तेरे लब पर मेरा नाम आएगा! कभी तो मेरी चाहत का पैगाम आएगा! खींच लेगी तुमको कभी यादों की खूशबू, कभी तो तेरी... Read more