जिम्मेदारी( लघुकथा)

जिम्मेदारी ( लघुकथा)
हैलो सुधा, माँ ने अपनी बेटी को फोन करके पूछा- बेटा ऑफिस से कितने बजे निकलोगी?
सुधा ने माँ को उत्तर दिया- माँ,दस बजे मेरी शिफ्ट खत्म होगी।मैं दस बजे ऑटो पकड़ कर घर आ जाऊँगी।आप परेशान मत हो।
दस बजने पर सुधा अपना पर्स उठाकर ऑफिस से ऑटो पकड़ने के लिए निकली तो उसे कोई ऑटो नहीं मिला।कुछ देर बाद उसके दूर के एक रिश्तेदार आ गए।उन्होंने सुधा से पूछा- क्या हुआ सुधा? इतनी रात गए यहाँ कैसे?
सुधा ने बताया- कि मैं यहीं काॅल सेंटर में काम करती हूँ ।घर जा रही हूँ पर आज ऑटो नहीं मिल रहा ?
उसके रिश्तेदार सुधीर ने कहा- आप कहो तो मैं आपको घर छोड़ दूँ।इतनी रात में आप सड़क पर अकेली ऑटो का इंतज़ार कब तक करेंगी।
कुछ देर सोचने के बाद सुधा ने कहा- ठीक है,लिफ्ट देने के लिये धन्यवाद।सुधा के सरल, सौम्य व्यवहार के कारण थोड़ी दूर चलने के बाद अंधेरे सुनसान इलाके में सुधीर ने बाइक रोक दी और उसके अकेले का फायदा उठाने की कोशिश करने लगा। बड़ी मुश्किल से अपने आपको उस दरिंदे से बचाकर सुधा घर पहुँची तो बिलकुल चुप थी।
माँ ने पूछा- क्या हुआ बेटी , तू चुप क्यों है?सुधा सोचने लगी कि माँ को आज की घटना बताऊँ तो कैसे?
माँ के ऊपर क्या गुजरेगी?माँ तो घटना के विषय में जानकर परेशान हो जाएगी।नौकरी नहीं करने देंगी।फिर माँ का इलाज नहीं हो पाएगा और छोटे भाई की पढ़ाई भी खटाई में पड़ जाएगी। यह सोचकर उसने मन के छालों को अंदर ही दबा लिया।
डाॅ बिपिन पाण्डेय

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