लघुकथा - सँवरते सपने

लघुकथा: ** सँवरते सपने **
#दिनेश एल० “जैहिंद”

सारा दिन ऑफिस टू ऑफिस चक्कर लगाने के बाद जब मधुरिका शाम ढलते घर वापस लौटी तो उसकी माँ ने उससे कहा,- “छोड़ो अब ये हीरोइन बनने का चक्कर मधु । बहुत हो गया स्ट्रगल ! क्या सारी जिंदगी हीरोइन बनने का ख्वाब ही सजाती घूमती फिरेगी ?”
माँ की बात खतम होते ही पिता ने भी तत्काल इंट्री मारी,- “ हाँ बेटा, ये ठीक नहीं है । जिंदगी बहुत लंबी-चौड़ी होती है । यह सिर्फ़ सपनों के सहारे नहीं कटती ।” मधुरिका चुपचाप सुने जा रही थी, और बोलने का मन बनाते हुए खुद को फ्रेस करने में लगी रही । लेकिन उसे बोलने का मौका नहीं मिला, क्योंकि तुरंत उसकी माँ की आवाज़ फिर उसके कानों में शीशे-सी पड़ी,- “हाँ बेटी, पापा तुम्हारे ठीक कह रहे हैं । कल तुम कहीं नहीं जा रही हो । कल तुम्हें देखने के लिए कुछ लड़केवाले आ रहे हैं । पूरी तैयारी हो चुकी है ।”
“ओह्ह मॉम ! मधुरिका जैसे तिलमिला-सी गई और तुनकते हुए बोली,-“ नहीं मम्मी, आप ऐसा नहीं कर सकतीं, पापा को आप समझाइए । इतने सालों की मेहनत को कुछ सेकेंडों में मैं नहीं बिखरने देने वाली । आप लोग लड़केवाले को मना कर दीजिए । कहिए, लड़की शादी के लिए तैयार नहीं है ।”
“मगर क्यों बेटा ?” पिता ने विनम्रता के साथ पूछा,- “मेरी इज़्ज़त का सवाल है बेटा ?”
“मेरी भी प्रेस्टिज का सवाल है पापा !” मधुरिका ने जैसे छाती उतानकर कहा,- “मेरी भी जिंदगी दाव पर लगी है ।”
इतना कहकर मधुरिका खूँटी से बैग उतारी और चलते हुए माता-पिता के पास आई, फिर एक लिफ़ाफ़ा उनके आगे बढ़ा दिया ।
उसके पिता ने लिफ़ाफ़ा खोला, और देखा कि उसमें एज़ ए मेन हीरोइन, लीड रोल का कॉन्ट्रैक्ट पेपर और पचहत्तर हज़ार का एक चेक था ।
और जैसे ही माता-पिता ने विस्मित होकर सिर ऊपर उठाया वैसे ही मधुरिका ने उनके मुँह में एक-एक रसगुल्ले डाल दिए, रसगुल्ले चबाते हुए माता-पिता ने मधुरिका को गले लगा लिया ।

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दिनेश एल० “जैहिंद”
29. 01. 2018

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