लघुकथा : " वो बच्ची और चूङियां "

“मम्मी मुझे चूङियां नहीं अच्छी लगती ऐसी ,आप वापस कर दो” रुचिका की बारह वर्षीय बेटी नव्या ने मुंह बनाकर कहा। रुचिका तेजी से दरवाजे तक गई पर चूङी वाला जा चुका था।
रुचिका वापस आकर बैंगल बाक्स में चूङियां जमाने लगी। दो दिन बाद हरियाली तीज पर पहनने के लिए हरी हरी सुंदर कांच की चूङियां खरीदीं थी रुचिका ने ।तभी नव्या के माप की चूङी देखकर उसने ये सोचकर ले लीं कि बङी हो रही है शायद उसे अच्छी लगें तो तीज के त्यौहार पर पहन लेगी।
पर नव्या ने देखकर मुंह बना दिया तो रुचिका दिमाग दौङाने लगी कि इतने माप की चूङियां किसे दूं।
वैसे बङी सुंदर थीं हरी हरी चूङियां।
“अरे हां ! बगल वाली मालती के घर एक नव्या जितनी बच्ची आती है काम करने मासूम सी , कितनी हसरत भरी नजरों से चूङी वाले की चूङियां देख रही थी वो आज।” रुचिका ने एकाएक आए विचार पर खुश होकर बुदबुदाया ” उसी को दे दुंगी , अभी जा चुकी होगी कल दुंगी , बहुत खुश हो जाएगी “।
मन हल्का हो गया रुचिका का कि चलो चूङियों का सही ठिकाना मिला।
अगले दिन दस बजे का इंतजार करती रुचिका को वो बच्ची अपने समय पर आती न दिखी तो वो खुद चूङियां लेकर पङोस वाली मालती के घर पहुंच गई।
पता चला उस बच्ची की आज तबियत ठीक नहीं तो उसकी मां आई है काम पर।
“चलो इसको ही दे दूं कल बच्ची पहन लेगी त्यौहार पर ” सोचकर रुचिका ने चूङियां उसकी मां को देते हुए कहा ” अपनी बेटी को दे देना चूङियां हैं, कल पहन लेगी वो ,मुस्करा कर कहा रुचिका ने कहा।
पर अगले ही पल काम वाली के आंखों में आंसू देख कर रुचिका को समझ नहीं आया कि हुआ क्या।
चूङियां वापस करते हुए कामवाली ने कहा ” मेमसाब आप रख लीजिए , ये उसके किसी काम की नहीं “उदास होकर कहा उसने।
“पर क्यों ?” रुचिका आश्चर्य में थी।
“क्योंकि वो बाल विधवा है”
हरी चूङियां रुचिका के हाथ से छूटकर फर्श पर बिखर गईं
और अनेक तीखे सवाल माहौल में ।।।।।।

अंकिता

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