लघुकथा--पिंजरे का पंछी

गुड़िया का जन्म एक झोपड़ी में हुआ था ।वो छः बहनों में सबसे छोटी थी । दो भाई भी थे । माँ चौका बर्तन करती थी वो भी माँ के साथ जाती और चुपके से चीनू की किताबें पलटती रहती । शुभी बहुत दिनों से ये देख रही थी । एक दिन पूछा पढ़ना सीखोगी । सुनते ही मुस्कुरा उठी गुड़िया । शुभी ने उसकी माँ से कहा दोपहर में इसे भेज दिया करो । कुछ मेरे काम भी कर देगी और इसे पढ़ा भी दिया करूँगी । खाना भी खिला दूंगी । माँ ने भेजना शुरू कर दिया । बहुत मेधावी और मेहनती थी गुड़िया । चीनू से पहले ही सीख जाती थी सब कुछ । शुभी की भी बहुत सेवा करती थी । शुभी माँ को समय समय पर कुछ पैसे दे देती थी इसलिये उसने गुड़िया को आने से नही रोक । ऐसे ही सालों बीत गए।चीनू के साथ साथ गणित हिंदी पढ़ती रही । हिंदी मीडियम की किताबें भी उसको दिलवा दी थी जिन्हें वो रात को अपने घर पर पढ़ती रहती थी । शुभी ने हाई स्कूल का प्राइवेट फॉर्म भरवा दिया था ।आज गुड़िया ने 1st डिवीज़न में हाई स्कूल की परीक्षा पास कर ली थी । पर गुड़िया उदास थी शराबी बापू ने उसकी शादी तय कर दी थी । शुभी उसके घर गई और गुड़िया को आगे पढ़ाने से लेकर शादी तक की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेकर उसे वहां से बचा लाई ।उसे पता था एक दिन अपने पैरों पर खड़ी होकर गुड़िया खुद अपना जीवन साथी भी चुन लेगी । आज पिंजड़े का पंछी आज़ाद हो गया था ऊंची उड़ान भरने के लिए ……

डॉ अर्चना गुप्ता

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