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लघुकथाएं

ashok dard

ashok dard

कविता

March 26, 2017

विमला को गाँव वाले मास्टरनी कह कर बुलाते थे | क्योंकि उसके पति गाँव के सरकारी स्कूल में मास्टर जो थे |गाँव में मास्टरनी को भी मास्टर जी की तरह ही सम्मान प्राप्त था | विगत दो वर्ष पहले गाँव के स्कूल में वार्षिकोत्सव मनाया गया तो कई गणमान्य लोगों के साथ – साथ मास्टरनी भी उस समारोह में मास्टर जी के साथ मुख्यतिथि के साथ बैठी थी | मास्टरजी के साथ उसे भी अन्य लोग बराबर सम्मान देते थे | ये सब उसे भी अच्छा लगता था | वक्त ने करवट बदली ,मास्टरजी की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई | दुखों के पहाड़ के नीचे मास्टरनी दब गई | तीन बच्चों का बोझ और खुद ,चार जनों को उठाने में उसकी पीठ लड़खड़ाने लगी | बड़ी जद्दोजहद के बाद उसे दैनिक भत्ते पर उसी स्कूल में चपड़ासी की नौकरी मिल गई | चूंकि वह आठवीं तक ही पढ़ी थी | कल की मास्टरनी अब चपड़ासिन बन स्कूल जाने लगी | कल तक जो लोग उसे दुआ-सलाम करते थे आज उससे मांगने लगे | उसे अन्दर ही अन्दर ये सब अच्छा न लगता मगर मरता क्या न करता ? बेबसी – लाचारी उसकी नियति थी | बच्चों व खुद का बोझ ढोने के लिए नौकरी जरूरी थी | तीन बरस नौकरी बीत गई | आज फिर स्कूल में वार्षिकोत्सव था | मुख्याध्यापक ने उसे सुबह जल्दी बुलाया था | इसलिए वह निर्धारित समय से पहले स्कूल में पहुँच गई | अभी तक कोई भी स्कूल में नहीं पहुंचा था | आफिस व कमरों की सफाई करके वह स्टाफ रूम में रखी कुर्सी पर आराम के लिए अभी बैठी ही थी तभी स्कूल के तीन चार अध्यापक आ गये | वह कुर्सी से उठने ही वाली थी कि एक ने उसे देख लिया उसे देखते ही वह उसे झिड़कते हुए बोला ,विमला बड़ी बाबू बन कर कुर्सी पर आराम फरमा रही हो ,अपने स्टूल पर बैठा करो | विमला कुर्सी से तो उठ गई थी परन्तु उसे अपने पैरों के नीचे से जमीन खिसकती हुई लग रही थी | वह बुझे – बुझे कदमों से सबके लिए पाणी ले आई थी | तीन बरस पहले के वार्षिकोत्सव और इस वार्षिक उत्सव का फर्क उसके मानसपटल से गुजर रहा था |तीन बरस में ही मास्टरनी चपड़ासिन हो गई थी | नियति को स्वीकार कर अब वह खिसकती जमीन पर बुझे कदम लिए सभी आगंतुकों को पानी पिला रही थी , कुर्सियां दे रही थी | ये सब समय का फेर था …..||

अशोक दर्द

दो दृश्य [लघुकथा ]

पहला दृश्य : मेरे घर के पास ही अपने पिल्लों के साथ एक कुतिया नाली के बगल में पड़े कूड़े के ढेर पर अपने तथा पिल्लों के लिए रोटी तलाश लेती थी | आज रात भारी बर्फवारी हुई | कूड़े का ढेर बर्फ में दब गया था | कुतिया अपने पिल्लों को लेकर मेरे कमरे के सामने बन रहे नये मकान में लेकर आ गई | मकान के एक कमरे में सीमेंट की खाली बोरियां पडी थीं | उसने वहीँ अपना डेरा जमा लिया था | दिन जैसे – जैसे चढ़ने लगा भूखी कुतिया के स्तनों को भूखे पिल्ले चूस – चूस कर बुरा हाल करने लगे शायद स्तनों से निकलता दूध उनके लिए पर्याप्त नहीं था | भूखे पिल्लों की चूं – चूं की आवाजें हमारे कमरे तक आ राही थीं | मेरी पत्नी ने जब यह दृश्य देखा तो रात की बची रोटियां लेकर उस कमरे की ओर चल दी |मैं खिडकी से ये सब देखे जा रहा था |जैसे ही वह वहाँ पहुंची कुतिया उसे देखकर जोर जोर से भौंकने लगी |ऐसे लगा मनो वह मेरी पत्नी पर टूट पड़ेगी | तभी मेरी पत्नी ने उसे प्यार से पुचकारा और रोटियां तोड़कर उसके मुंह के आगे डाल दीं |अब कुतिया आश्वस्त हो गई थी कि उसके बच्चों को कोई खतरा नहीं है | कुतिया ने रोटी सूंघी और एक तरफ खड़ी हो गई | भूखे पिल्ले रोटी पर टूट पड़े | कुतिया पास खड़ी अपने पिल्लों को रोटी खाते देखे जा रही थी | सारी रोटी पिल्ले चट कर गये |भूखी कुतिया ने एक भी टुकड़ा नहीं उठाया |मातृत्व के इस दृश्य को देख कर मेरा ह्रदय द्रवित हो उठा और इस मातृधर्म के आगे मेरा मस्तक स्वतः नत हो गया |
दूसरा दृश्य : यह दृश्य भी मेरे ही शहर के थाने का था | एक महिला पुलिस कर्मी की गोद में डेढ़ साल की बच्ची चिपकी थी |पूछने पर पता चला कि कोई महिला इसे जंगल में छोड़ गई थी कि कोई हिंसक जानवर इसे खा जायेगा | परन्तु ईश्वर की कृपा किआर्मी एरिया होने के कारण पैट्रोलिंग करते जवानों ने बच्ची के रोने की आवाजें सुनी तो उसे उठा लाए और पुलिस के हवाले कर दिया | जंगल में बच्ची मिलने की खबरें अख़बारों की सुर्खियाँ बनी तो पता चला बच्ची की माँ प्रेमी संग फरार है और पिता को बच्ची कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के उपरांत ही सौंपी जायेगी | सब लोग उस बच्ची की माँ को लानतें दे रहे थे | मेरे द्वारा देखे गये दोनों दृश्य मेरे मानस पटल पर रील की भांति आ – जा रहे थे | दूसरे दृश्य को देख मैं अन्दर ही अन्दर पिघलने लगा था ……||

कर्जमुक्त [लघुकथा ]
एक वक्त था , सेठ करोड़ीमल अपने बहुत बड़े व्यवसाय के कारण अपने बेटे
अनूप को समय नहीं दे पा रहे थे | अतः बेटे को अच्छी शिक्षा भी मिल जाये
और व्यवसाय में व्यवधान भी उत्पन्न न हो इसलिए दूर शहर के बोर्डिंग स्कूल में
दाखिल करवा दिया | साल बाद छुट्टियाँ पडतीं तो वह नौकर भेज कर अनूप को घर
बुला लाते | अनूप छुट्टियाँ बिताता स्कूल खुलते तो उसे फिर वहीँ छोड़ दिया जाता
| वक्त बदला, अब अनूप पढ़-लिख कर बहुत बड़ा व्यवसायी बन गया और सेठ करोड़ी मल बूढ़ा हो गया | बापू का अनूप पर बड़ा क़र्ज़ था | उसे अच्छे स्कूल में जो पढ़ाया – लिखाया था | बापू का सारा कारोबार बेटे अनूप ने खूब बढ़ाया – फैलाया | कारोबार में अति व्यस्तता के कारण अब अनूप के पास भी बूढ़े बापू के लिए समय नहीं था | अतः अब वह भी बापू को शहर के बढ़िया वृद्धाश्रम में छोड़ आया और फुर्सत में बापू को घर ले जाने का वायदा कर वापिस अपने व्यवसाय में रम गया | वृद्धाश्रम का मोटा खर्च अदा कर अब वह स्वयं को कर्जमुक्त महसूस कर रहा था ||

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Author
ashok dard
अशोक दर्द लेखन-साहित्य की विभिन्न विधाओं में निरंतर लेखन व प्रकाशन सम्मान- विभिन्न सामजिक व साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित वर्तमान पता-प्रवास कुटीर बनीखेत तह. डलहौज़ी जि. चम्बा (हि.प्र) मोबाइल -9418248262 ईमेल-ashokdard23@gmail.com

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