*लगी नज़रिया रे*

गीत…..!
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*लगी नज़रिया रे*
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सूने-सूने मन के पनघट, रीती पड़ीं गगरिया रे ।
किस बैरी की लगी रूप को, जाने बुरी नज़रिया रे ।।
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बहुत दिनों से मन के आॅगन , नहीं नेह बरसात हुई ,
साथ चला करते थे हिलमिल, वो अतीत की बात हुई ,
नागफनी मन में उग आईं, ऐड़ी चुभें कॅकरिया रे ।१
*
छुआछूत ने भेदभाव ने, माँ के दिल को चीर दिया,
याद नहीं कितने दिन पहले, प्रेम भाव का नीर पिया ,
वैमनस्य की घिरी घटायें, गरजें द्वेष बिजुरिया रे ।२
*
धन लोलुपता सुरसा जैसी, मुँह फैलाये अड़ी हुई,
निकले पूत कपूत मात के, कील हृदय में गड़ी हुई ,
खोया भाई-चारा सिसके, ढूंढे गाँव नगरिया रे ।३
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आओ यत्न करें सब मिलकर, बैठें पुनः विचार करें,
क्या खोया है क्या पाया है, नज़रों पर फिर धार धरें,
सोये हुए दिलों में जागें, ईसा खुदा सॅवरिया रे ।४
*
पुनः नवल शृंगार करें हम, अपनी भारत माता का ,
जिसे देखकर अमर शहीदों , का मन कभी लुभाता था,
दमके माँ की हरी घघरिया, गोटे जड़ी चुनरिया रे ।५
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– महेश जैन ‘ज्योति’
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२३/०१/२०१८

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