लक्ष्मनियाँ

एक दिन अस्पताल में सुबह पहुंचा तो देखा हमारे अधीनस्थ एक साथी कर्मचारी बड़ी खुशी खुशी पूरे अस्पताल में बूंदी के लड्डू सबको बांट रहे थे । थोड़ी देर में वो मेरे पास भी आकर चहचहाते हुए बोले
‘ लड्डू लीजिए । ‘
मैंने सामने बैठे अपने फार्मासिस्ट से उनकी ओर इशारा करके पूंछा
‘ यह किस खुशी में ? ‘
फार्मेसिस्ट ने मुझे बताया
‘ कल इनके बेटे की शादी हुई है और इसी खुशी में यह लड्डू बांट रहे हैं हैं ‘
फिर उस साथी सहयोगी ने भी अपनी खुशी से चमकती हुई आंखों और हर्ष मिश्रित वाणी से फार्मेसिस्ट साहब के उत्तर से सहमति जताते हुए कहा
‘ हां साहब हां ! हमारे घर में लक्ष्मी आई है ‘
मैंने भी लड्डू ले लिया और उसे बधाई दी ।
इस बात को कुछ दिन गुजर गए । एक दिन जब मैं सुबह ओपीडी पहुंचा तो देखा मेरे वही लड्डू बांटने वाले सहयोगी अपनी पत्नी के समेत अस्पताल के प्रांगण में एक साथ एक बेंच पर अगल-बगल अपने अपने हाथों से अपना अपना सिर पकड़े बैठे थे । उनके सिर से खून बह कर गालों पर सूख के जम गया था । पति ने अपना सिर गमछे से दबा रखा था और उनकी पत्नी ने अपनी धोती के पल्लू से सिर को दबा रक्खा था । वह दोनों शांत , उदास और चुपचाप बैठे थे ।
मैंने उनका यह हाल देखकर अपने फार्मेसिस्ट से उनकी ओर इशारा करके पूछा
यह क्या हो गया इन्हें ?
मेरे फार्मेसिस्ट ने मुझे बताया
‘ साहब लक्ष्मी जी ने आज प्रातः इन्हें प्रसाद दिया है ! ‘
मुझे शशोपन्ज में पढ़ते देख उसने अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए मुझे समझाया कि ये साहब उस दिन लड्डू बांटते समय यही तो कह रहे थे कि घर में लक्ष्मी ( पुत्र वधू ) आई है ।आज उसी लक्ष्मिनियाँ ( नई पुत्र वधू ) से इनका झगड़ा हो गया , जिसमें वह इन दोनों पे भारी पड़ी , उसी ने इन दोनों को डंडे से पीटा है और अब ये दोनों अपनी चोटों की मरहम पट्टी कराने और दवा लेने के लिए यहां आए हैं ।
मैं उनके झगड़े की तह में नहीं जाना चाहता था । नासमझी परिस्थितियों वश आपसी घरेलू या व्यवहारिक संबंध कितने क्षणभंगुर हो तीव्रता से बदलते हैं और बात लड्डुओं के वितरण से हटकर लठ्म लट्ठ पर आ जाती है । उनकी यह हालत देखकर मुझे दुःख हुआ ।
घरेलू हिंसा किसी भी तरफ से हो वर्जनीय , निंदनीय एवं दंडनीय है।

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