Nov 16, 2019 · कविता
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रोशनी

जब अँधेरा गहरा गया तो सोचना पड़ा रोशनी को,
अब भी न निकली तो कहीं बहुत देर न हो जाये,
यह अँधेरा छा जाये, सब जगह,
केवल जगह ही नहीं मन मस्तिक पर,
दरों-दीवार पर ही नहीं,दिलों पर
सोच कर ही घबराई …
जल्दी से इक बंद दरवाजे की दरार से निकल आयी,
सहसा नहा गया,
सारा संसार रोशनी से,
रोशनी हंसी, मुस्काई,
व्यर्थ ही इतना घबराई ,
अँधेरा कितना ही स्याह क्यों न हो,
मेरी किरण सृष्टि के कण कण में है समाई
केवल कण में कहाँ,
हर मनुष्य हृदये ने आशा के रूप में हूँ बसाई,
जाने फिर क्यों मैं इतना घबराई ?..

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अंजनीत निज्जर
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कवयित्री हूँ या नहीं, नहीं जानती पर लिखती हूँ जो मन में आता है !!... View full profile
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