कविता · Reading time: 1 minute

रोम जले.. भले जले,

सजावट से सजा रह गया मंडप,
जब दुल्हन ही….घर छोड़ चली,
.
वजह सिर्फ इतनी थी,
घरवालों ने वक्त पर सुनी नहीं,
.
हर बार साँप तो निकल जाता है,
हम लकीरें पिटते रह जाते हैं,
.
हमें खुशी नहीं बच्चों की प्यारी,
हमें है रस्म रीति-रिवाज परम्परा प्यारी,
.
आग लगे बस्ती में हम हैं मस्ती में,
रोम जले ..भले जले,
हम हैं झूठ पाखंड की मस्ती में,
.
महेंद्र,

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