गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

रोटी डाला करते थे

किस्मत पर ही सबकुछ टाला करते थे।
हम कर्मो का रोज़ दीवाला करते थे।।

यार गधों से जीत न पाए लेकिन हम।
घर में ही झाला घोटाला करते थे।।

अपनों से तो सदा रहे हैं ख़फ़ा मगर।
गैरों को तो खूब संभाला करते थे।।

चाट रहे हैं मुंह, लेकिन हम क्या बोलें।
बड़ी शान से इनको पाला करते थे।।

कुत्तों के ये ठाठ नही हैं, नए “विजय”।
तुम भी इनको रोटी डाला करते थे।।

विजय “बेशर्म” 9424750038

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