गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

रोटियाँ

इंसा को तो हर रोज नचाती हैं रोटियाँ
भूखों को अपनीओर लुभाती हैं रोटियाँ
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इंसा को भी इंसा से लड़ाती हैं रोटियाँ
वजूद ए जिंदगी भी बचाती हैं रोटियाँ
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चटनी के संग भी सुहाती हैं रोटियाँ
सालन के संग रंग जमाती हैं रोटियाँ
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किसी को सुखी सुखी भाती हैं रोटियाँ
तर घी भी आजमाई जाती हैं रोटियाँ
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कुत्ता कहीं किसी को बनाती हैं रोटियाँ
नारी कहीं जिस्मो से कमाती है रोटियाँ
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पसीना बहाके ही तो आती हैं रोटियाँ
इंसा को मेहनतकश बनाती हैं रोटियाँ
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देश मेरे जैसी कहाँ मिल पाती हैं रोटियाँ
कपिल चल घर अपने बुलाती हैं रोटियाँ
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कपिल कुमार
04/11/2016

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