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रोटियाँ

बेचैन कर जाता है
कभी कभी
रोटियों का गोल होना
सदियों से रोटियां गोल हैं
कोई नहीं उठाता आवाज़
रोटियाँ गोल ही क्यों हैं
रोटियों का आकार
भ्रमित कर जाता है
छू जाता है
मन को
आखिर लोग सदियों से
कर क्या रहे हैं
जो
रोटियाँ
आज भी गोल है।
बदलो ना
रोटियों को
रोटियों के लिए सोच को
रोटियाँ शर्मिंदा ना हों
ये भी सोचो
सोचो कि
अब भी वक़्त है
बदल जाएँगी रोटियाँ
बदल देंगी हमारी
मानसिकता को
खुद में प्रयुक्त
अनाज
गेहूं के समान
गेहूं संस्कारित ही रहा हो
आवश्यक तो नहीं
फिर बचो
रोटियों से
जब तक वह बदल ना जाए
उसके भीतर जो अनाज है
वह तुम्हें जीने नहीं देगा
रोटियाँ रोकर भी
क्या करेंगी
वह गोल है
गोल ही रहेंगी
रोटियाँ
हाँ वही
जो तेरे घर मे पकती है
पकती हैं वही
झुंझलाती रोटियाँ
मेरे घर मे भी
और फिर
बेचैन कर जाता है मुझे
रोटियों का
गोल होना।
-अनिल मिश्र,प्रकाशित

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Author
अनिल कुमार मिश्र शिक्षा-एम ए अंग्रेज़ी,एम ए संस्कृत,बी एड जन्म 9.6.1975,राँची,झारखंड विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित काव्य संकलन'अब दिल्ली में डर लगता है'(अमेज़न,फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध) लगभग 20…
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