बाल कविता · Reading time: 1 minute

“रेलगाड़ी”

“रेलगाड़ी”
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कई डब्बों की , हो जो गाड़ी,

कहलाती है, वो ही रेलगाड़ी,

आगे लगा , एक इंजन होता,

जहां बैठा, दो सज्जन होता;

पटरी पर सदा दौड़े वो गाड़ी,

बैठते हैं,उसमें बहुतों सवारी;

सभी सवारी, यात्री कहलाते,

आपस में सब,खूब बतियाते;

इसको ट्रेन भी हमसब कहते,

जिसमे सिर्फ, माल भरे रहते;

उसे हमसब मालगाड़ी कहते;

छुक-छुक,छुककर ये चलती;

फिर, हवा से ही बातें करती;

मारे सिटी, और भागे सरपट;

ब्रेक लगे और रुके ये झटपट,

ठहरे ये,प्लेटफार्म पर हरबार,

यात्रीगण जाये, तब घर-बार।

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….. ✍️प्रांजल
……..कटिहार।

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