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** रेत से मनसूबे **

भूरचन्द जयपाल

भूरचन्द जयपाल

कविता

March 12, 2017

रेत से मनसूबे तेरे
कब तक ठहर पाएंगे
आश्वासन रूपी छींटे
कब तक रोक पाएंगे
बिखरे सपनों को तेरे
हिफाजत से रख पाएंगे
धूप अरमानो को सुखा देगी
ऊष्मा अपनी कब तक
दिल के घरोंदे में बचा पाओगें
ये असफलता का सूरज
नमी सोख लेगा सारी और
सपने तेरे बालू रेत की माफिक
जर्रा जर्रा में बिखर जायेंगे ।।
?मधुप बैरागी

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Author
भूरचन्द जयपाल
मैं भूरचन्द जयपाल 13.7.2017 स्वैच्छिक सेवानिवृत - प्रधानाचार्य राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, कानासर जिला -बीकानेर (राजस्थान) अपने उपनाम - मधुप बैरागी के नाम से विभिन्न विधाओं में स्वरुचि अनुसार लेखन करता हूं, जैसे - गीत,कविता ,ग़ज़ल,मुक्तक ,भजन,आलेख,स्वच्छन्द या छंदमुक्त रचना... Read more

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