Sep 3, 2016 · कविता
Reading time: 1 minute

रूह

रूह एक दिन बदन से निकल जायेगी
बस यूँ ही तकदीर सभल जायेगी

किरण आसमा बन लपट जलं जायेगी
नीचे वालों की क्यूं याद कल जायेगी

नदियाँ बह चट्टान में बदल जायेगी
हिमालय की गोद फिर छल जायेगी

जेहन मे छुपी चाह यूँ ही टल जायेगी
जब तेरी पोल फिर से खुल जायेगी

खामोशियाँ कुछ कह उछल जायेगी
हिचकियाँ जब तलक मचल जायेगी

एक दिन खुदा की खुदाई चल जायेगी
जब वह तुझे फिर से मिल जायेगी

यूँ आस फिर मिलन की मधु पल जायेगी
जब हवा जमाने की फिर बहल जायेगी

डा मधु त्रिवेदी

1 Like · 37 Views
Copy link to share
डॉ मधु त्रिवेदी
515 Posts · 31.7k Views
Follow 33 Followers
डॉ मधु त्रिवेदी शान्ति निकेतन कालेज आफ बिजनेस मैनेजमेंट एण्ड कम्प्यूटर साइंस आगरा प्राचार्या, पोस्ट... View full profile
You may also like: