गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

रूलाये गीत अब तेरे बहुत है

रूलाये गीत अब तेरे बहुत है
पुरानी याद के ताजे बहुत है

खुशी सारी उजड़ती ही रही पर
मुहब्बत के यहाँ साये बहुत है

गगन में गागरे भरती निशा जब
तले अम्बर सजे जलसे बहुत है

सितारों चाँद से है आसमां यह
उजालों के घरों काले बहुत है

बिना पैसे न आयेगे रास मेले
खरीदे वस्तु सब मंहगे बहुत है

अकेले देख विधु को जब चमकते
निभा ले चाँदनी वादे बहुत है

गरीबों का उदर भरता नहीं जब
कटे बस जिन्दगी फांके बहुत है

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