Skip to content

रुबाइ गज़ल गुनगुनाने की रातें —– गज़ल

निर्मला कपिला

निर्मला कपिला

गज़ल/गीतिका

August 13, 2016

—-
रुबाइ गज़ल गुनगुनाने की रातें
उसे हाल दिल का सुनाने की रातें

वो छूना छुआना नज़र को बचा कर
शरारत अदायें दिखाने की रातें

रुहानी मिलन वो जवानी का जज़्बा
मुहब्बत मे हँसने रुलाने की रातें

न चौपाल पीपल बचे गांव मे अब
कहां रोज़ मह्फिल सजाने की रातें

अगर रूठ जाये तो मनुहार करना
उसे याद कसमे दिलाने की रातें

कुछ उलझी लटें गेसुओं का वो सावन
रहीं प्यार मे भीग जाने की रातें

कई फलसफे ज़िन्दगी जो न भूली
कटी छुप के आंसू बहाने की रातें

जो सपने सिरहाने रख कर थे सोये
अब आई हैं उनको उठाने की रातें

खिलाना पिलाना रिझाना गया सब
गयीं बीत यूं ही मनाने की रातें

Share this:
Author
निर्मला कपिला
लेखन विधायें- कहानी, कविता, गज़ल, नज़्म हाईकु दोहा, लघुकथा आदि | प्रकाशन- कहानी संग्रह [वीरबहुटी], [प्रेम सेतु], काव्य संग्रह [सुबह से पहले ], शब्द माधुरी मे प्रकाशन, हाईकु संग्रह- चंदनमन मे प्रकाशित हाईकु, प्रेम सन्देश मे 5 कवितायें | प्रसारण... Read more
Recommended for you