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रिश्तों की वह डोर

RAMESH SHARMA

RAMESH SHARMA

दोहे

May 16, 2017

मैने खुद ही तोड दी,.रिश्तों की वह डोर!
लगी स्वार्थ वश जो मुझे,क्षीण और कमजोर!

निर्बल दुर्बल हो रहे,ताकतवर बलवान !
लोकतंत्र की देश मे,यह कैसी पहचान! !

अँधा हो कानून जँह, बहरी हो सरकार!
निर्बल की सुनता नही,कोई वहाँ पुकार! !
रमेश शर्मा.

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RAMESH SHARMA
अपने जीवन काल में, करो काम ये नेक ! जन्मदिवस पर स्वयं के,वृक्ष लगाओ एक !! रमेश शर्मा
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