कविता · Reading time: 1 minute

रिश्ते

जो रिश्ते दम तोड़ रहे वो
अर्थहीन हो जाते हैं,
जीवन की जागीर बने ये
अपनों को तड़पाते हैं।
रिश्ते

कई रंग में रँगे हुए ये
अब तक समझ न पायी हूँ,
दाँव-पेच कानूनी लगते
धोखा खाती आयी हूँ।
नफ़रत का विषपान कराके
जहाँ-तहाँ बस जाते हैं।
जीवन की जागीर बने ये
अपनों को तड़पाते हैं।

दीवारों में पड़ी दरारें
बेबस रिश्ते रोते हैं,
पूर्णविराम लगा आशा पर
संबंधों को खोते हैं।
ऋण माता का कौन भरेगा?
पूत कपूत कहाते हैं।
जीवन की जागीर बने ये
अपनों को तड़पाते हैं।

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