रिक्शावाला

अक्सर हम जब कभी कहीं आते-जाते , थके हारे, मौसम की मार झेलते और शापिंग के बाद हाथों में सामान का बोझ उठाए , एक अदद ‘रिक्शा’ की तलाश में होते हैं तब रिक्शा दूर-दूर तक कहीं दिखाई ही नहीं देता और यदि बामुश्किल कोई एक आता दिखाई देता भी है तो हमारे ‘भैयाजी चलोगे क्या ?’ का जवाब वह सांवला,दुबला-पतला लेकिन चेहरे पर दर्प और स्वाभिमान की चमक बिखेरे ,फटी-पुरानी कमीज़, घुटनों तक चढ़ी पेंट और सिर पर बेतरतीबी से गमछा लपेटे , बड़े ही अभिमानी भाव से गर्दन दांए बांए मोड़, एक हाथ हिला कर कहता है ‘ नहीं! ‘
तब गुस्से में हम मन ही मन बड़बड़ाते है ”ऊंह्ह , पैसों की कद्र ही नहीं , नखरे देखो , मेहनत तो करना ही नहीं चाहते , चलता तो चार पैसे का फायदा ही हो जाता इसका . बस अपने इन्हीं नखरों की वजह से ही तो ये रिक्शा ही चलाता रहेगा पूरी उम्र ! ‘
और तभी पीछे से कोई कहता है ‘बहनजी, ये इनके खाने का समय है, इस वक्त तो ये भगवान की भी नहीं सुनते ! ‘
जी हां , रिक्शा वाला , वो जो इस ओला,ऊबर वाले डिजिटल युग में भी हमारा बोझ अपने शरीर पर लाद कर गंतव्य तक पहुंचाने की जद्दोजहद में खुद रोज़ न जाने शारीरिक और मानसिक रूप से कितना पीछे छूटता चला जाता है !
तो उसमें इतना स्वाभिमान ?
इस कदर अहंकार ?
अरे हमें देखो , हम काम में इतना व्यस्त रहते हैं कि खाने की फुर्सत ही नहीं मिलती ! तभी तो पैसा आता है और स्टेट्स मेंटेन होता है!
और इन जैसों की यूं गरीबी की मार झेलते हुए भी काम और कमाई को मना करने की हिम्मत ?
तो क्या वजह है जो एक गरीबी का दंश झेल कर दयनीय अवस्था में रहने वाले में इतना अहंकार भरा रहता है कि पैसों की तंगी के बावजूद सवारी को मना करने का दम रखता है जबकि कोई खरबपति भी एक नए पैसे का नुकसान सहने को तैयार नहीं !
इसके पीछे राज़ है , ‘दो वक्त की रोटी!’
रिक्शा वाले रोज़ कमाने-खाने वाले होते हैं ! जिस रोटी के लिए वे सर्दी-गर्मी,बारिश-धूप की परवाह न करते हुए अपनी हड्डियां गलाकर जी तोड़ मेहनत करते हैं अक्सर उसी ‘रोटी’ को खाने वाले ‘बख़त’ के बड़े पाबंद होते हैं .
शायद वही हैं जो इसकी कीमत जानते हैं !
क्योंकि उन्हें पता है कि कल रोटी मिले न मिले तो आज वर्तमान में जो नसीब हुई है उसका तो आनंद लिया जाए !
यह वास्तव में सोचने वाली बात है कि अपने भविष्य को सुरक्षित रखने की आपाधापी में हम शायद इतना व्यस्त हैं कि अपने इसी ‘रोटी’ के समय को भी अधिकतर काम के चलते टालने की सोचते रहते हैं!
रिक्शावाले और मजदूर लोग जो भी शारीरिक श्रम में लगे हुए हैं वे अपने इस समय को लेकर बहुत उत्साहित रहते हैं !
घर में जब कंसट्रक्शन का काम चला तो पाया कि मजदूर कितने उत्साह से ‘रोटी’ के वक्त का इंतज़ार करते हैं और मिल-बांट कर सूखी रोटी प्याज़ और मिर्च के साथ खाते हैं. तब लगता है कि जितना स्वाद लेकर ये इस रोटी को खा रहे हैं उतना स्वाद तो मुझे कभी फाइव स्टार होटल के खाने तक में नहीं आता!
और इसकी वजह शायद ‘रोटी’ का स्वाद नहीं अपितु ‘भूख’ का स्वाद होता है!
जिसने एक बार ‘भूख’ का स्वाद चख लिया वह ‘रोटी’ के ‘बखत’ और ‘स्वाद’ का हमेशा के लिए वैसा ही दीवाना हो जाता है जैसे रिक्शावाला !
ये लोग मेहनत मजदूरी से कमाई रोटी से केवल भूख ही नहीं मिटाते अपितु हर रोटी के साथ एक जश्न मनाते हैं !
क्योंकि जश्न अक्सर उम्मीद से अधिक मिलने पर ही मनाया जाता है !
और शायद हमारी तरह केवल बैंको में पैसा रखकर भविष्य सुरक्षित रखने की चाह में हम न जाने कितनी ही बार इस ‘रोटी के बखत’ को पीछे सरकाते रहते हैं !
क्योंकि हम जानते हैं कि वह ‘रोटी’ हर वक्त हमारी पहुंच में है !
और केवल वर्तमान में जीने वाले ये मेहनतकश लोग हमेशा अपने खुद के शहंशाह बन कर जीवन बिताते हैं ! हमें जब चाहा , ‘ना ‘ कहकर कि कभी ‘रोटी’ और कभी ‘आराम’ का वक्त है !
सच पूछो तो इस पृथ्वी पर सच्चे अर्थों में ‘बादशाह’ कोई है तो वह एक मेहनतकश मजदूर ही है !

‘भूख को जो जानते हैं
वही ‘रोटी’ की कीमत पहचानते हैं !’
©®Sugyata

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग द्वारा अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें सिर्फ ₹ 11,800/- रुपये में, जिसमें शामिल है-

  • 50 लेखक प्रतियाँ
  • बेहतरीन कवर डिज़ाइन
  • उच्च गुणवत्ता की प्रिंटिंग
  • Amazon, Flipkart पर पुस्तक की पूरे भारत में असीमित उपलब्धता
  • कम मूल्य पर लेखक प्रतियाँ मंगवाने की lifetime सुविधा
  • रॉयल्टी का मासिक भुगतान

अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- https://publish.sahityapedia.com/pricing

या हमें इस नंबर पर काल या Whatsapp करें- 9618066119

Like Comment 2
Views 5

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share