राष्ट्र अवनतिरूपमय भ्रम पकड, पंगा हो गया

प्रेम-पथ पर चला उस का ज्ञान गंगा हो गया|
बहा उल्टा जगत-तम का पूत चंगा हो गया|
ज्ञानी बन, यदि शांत तुम, नितांत फूटे ढोल-सम|
राष्ट्र अवनतिरूपमय भ्रम पकड, पंगा हो गया |

बृजेश कुमार नायक
“जागा हिंदुस्तान चाहिए” एवं “क्रौंच ऋषि आलोक”कृतियों के प्रणेता

पंगा= लँगड़ा,पंगु

Like Comment 0
Views 176

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share
Sahityapedia Publishing