राष्ट्रवाद और विवेक

एक आदमी धर्म अधर्म के मार्ग पर जब तक नहीं चल सकता जब तलक उसके पास अपना ज्ञान/विवेक बोध नहीं होता .
तब तक वह किसी #विचारधारा का #संवाहक ही रहता हैं .
हमारे यहाँ धरातल पर आदमी उपदेश के सहारे,
बिन उदाहरण बने. #सेलेब्रिटी बन जाते है.
यहाँ तक तथाकथित कथावाचक #भगवान बनना भी सहज है.

समाज पर वर्चस्व के लिए छल का सहारे अवश्य लेता है.
पहले छवि का महिमा-मंडन करते है,
फिर #राष्ट्रहित #राष्ट्रवाद के लिये,
#पैंतरे #हेकडी #धर्म_स्थापना के लिए #छल का प्रयोग.
कर्तव्य तो जबावदेही/जिम्मेदारी है.
लेकिन अधिकारों का हनन होता है.

जनता के हिस्से में #बेरोजगारी #भूख-लाचारी
जैसी बातें हिस्से में आती हैं .

लोग भी उनके #कार्यशैली की सराहना करते है.
लोग #प्रसंशक बन जाते है.
#भक्तिभाव में इंसान बिन #विवेक अंधा ही रहता है.
उसे अपने हित की बातें वा लड़ाई भी याद नहीं रहती.
जनता खुद ही अपनी बरबादी का उत्सव मनाती है !

वे #इतिहास से भी सीख नहीं लेती.
और समस्त गडे मुर्दे जिंदा हो उठते है.
और जनता बेताल-पच्चीसी जैसी कहानी का पात्र बनकर रह जाता है.

निष्कर्ष:-
आपका विवेक ही आपका मार्ग निर्धारित करता है,
उसे किसी के हाथों का कटपुतली न बनने दें !

#जीवन_एक_अभिव्यक्ति #पुस्तक #लेखक
#डॉ_महेन्द्र_सिंह_हंस

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