गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

रात बदरिया घिर-घिर आए….

रात बदरिया घिर – घिर आए
पास न कोई दिल घबराए

बागी हुआ निगोड़ा मौसम
आ धमकाए लाज न आए

उफ कैसी मनहूस घड़ी है
बात – बात पर जी अकुलाए

बेढब चालें चलती दुनिया
बिना बात ही बात बनाए

बुझी – बुझी सी लगे चाँदनी
करके इंगित पास बुलाए

किस गम में डूबा है चंदा
फिर-फिर आए फिर-फिर जाए

विरह – भुजंगम टले न टाले
बैठा भीतर घात लगाए

बैन रुँधे हैं नैन पिपासित
रैन न जाए चैन न आए

क्या – क्या और देखना बाकी
‘सीमा’ गम की कौन बताए

– सीमा अग्रवाल
मुरादाबाद (उ.प्र.)
“मनके मेरे मन के” से

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