रात पे नज़र है

कुछ की तो रात पे नज़र है,
कुछ शहर की आवाम से बेख़बर है,
कुछ नज़र मिलाते है चंदा से,
सितारों की रौशनी में, खोकर बेसब्र है,

कोई सितारा टूटे, या चाँद ही खो जाए,
अब ये मेरा इम्तिहान है, या तेरे प्यार का हुआ असर है,

तेरी नब्ज़ को देखकर, कहती है मेरी नज़र,
तेरा है वो अपनापन, या तन्हाई तू मुझसे बेखबर है,

ये शहर तेरा ही नहीं मेरा भी है,
में आवारा नहीं पर हर घर में, तेरे तनहा का बसेरा है,

आज सुन फिर तनहा ने कहा है,
नकाब में जो चेहरा है, तेरा ही नहीं नज़र मेरा है,

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