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राजयोगमहागीता:: गुरुप्रणाम:: मेरेतो परमात्मा : जितेन्द्र कमल आनंद ( पोस्ट६२)

गुरु प्रणाम:: घनाक्षरी
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मेरे तो परमात्मा ही सद्गुरु परब्रह्म
जिससे होना है मुझे सागर के पार है ।
‘ एकमेवपरब्रह्म’ कहकर गुरुवर ,
कराते हैं विदित उसे जो सारात्सार है ।
स्वर्णिम शुभम् यह हितकर है, आश्चर्य !
जिससे ब्रह्माण्ड ही यह निज संसार है।
करते प्रणाम उन्हें हम तो कोटि कोटिश:
जिससे सुखद यह निज परिवार है।।३!!

—– जितेन्द्र कमल आनंद

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