गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

राजनीति का नशा (हास्य -व्यंग्य रचना )

राजनीति का नशा जब सर चढ़कर बोलता है ,
मन -बावरा सत्ता के लिए मचल उठता है ।]

साधू,सन्यासी,पीर-फकीर तो क्या सूफी गायक,
इसके जादू से पहलू में इनके खींचा चला आता है ।

छोड़ी तो थी दुनिया इन्होने खुदा से मिलने को ,
मगर इस सुंदरी से भला किसी का दामन छुटता है ।

अभिनेता से कभी नेता बने ,तो नेता से फिर अभिनेता,
किस्मत आज़माते हुए इसके लिए पापड़ भी बेलना पड़ता है।

और क्यों न हो राजनीति की दुनिया है माया नगरी जैसी ,
धन ,रुतबा ,ऐश्वर्य और बहुत सम्मान जो यहाँ मिलता है।

देश-विदेश की मुफ्त सैर, बड़े -बड़े राजनायकों से मुलाकात ,
और नामचीन पत्र-पत्रिकाओं में बड़े बड़े लफ्जों में नाम छपता है ।

राजनीति में सत्ता का सुख मिले तो छोडना मत मेरे दोस्तों !,
इससे आपका ही नहीं,आपकी सात पुश्तों का जीवन सँवरता है।

यह राजनीति की दुनिया है करामती और चका -चौंध वाली ,
जिसका जितना भी मैला दामन हो ,स … ब !! छुप जाता है ।

सत्ता जिसको गले लगाए उसके फिर कहने ही क्या ”अनु” ,
जीतेजी महानता को और मरकर अमरता को प्राप्त होता है ।

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