राखी

बखत की मार म्हारै इस त्यौहार प बी पड़ी स,
भाभी नणंद नै ना बुलाण की जिद्द प अड़ी स।

बोली तेरी बाहण नै बुलावांगे तो खर्चा होवैगा,
मेरे घरां चालांगे उणनै फोणा की लाई झड़ी स।

इब पाछै सी तो आई थी जब दिए थे चार सूट,
दुसरै दिन तेरी बाहण बाहरणै रहवै खड़ी स।

इबकै कह दो कोरियर तै भेज देगी पौंचियाँ नै,
कहो देवर कै चली जावैगी के म्हारै वा जड़ी स।

जै वा आगी मेरे घर म्ह तै आछी बात ना होगी,
फेर मन्नै ना कहियो कि तू आई गेल्यां लड़ी स।

इतनी सुण कै वो बोल्या मेरी बाहण तै आवैगी,
मेरी बाहण के आण प तै तेरी सदा नाक चढ़ी स।

कदे आपणी छाती प हाथ धर कै सोच बात नै,
जब तेरी भाभी कह देगी तू किसी आड़े बड़ी स।

के बीतेगी तेरे दिल प, कित मुँह लहकोवैगी तू,
ठेकरे नै ठेकरा तैयार पावै ना न्यू बात घड़ी स।

इतनी सुण कै उसनै हाथ जोड़ कै गलती मानी,
बोली न्यू सोच माफ़ी दे दयो गलती तै झगड़ी स।

बुलाओ मेरी नणंद उसकै सारै ठाट मैं ला दूँगी,
वा खुद कहवैगी लेन देन म्ह सुलक्षणा तगड़ी स।

©® डॉ सुलक्षणा अहलावत

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लिख सकूँ कुछ ऐसा जो दिल को छू जाये, मेरे हर शब्द से मोहब्बत की...
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