रांझे की हीर

रांझे की हीर

कल तक करते देखा था मुहब्बत कि खिलाफत जिनको।
आज शिद्दत से करते पाया एक रांझे कि वकालत उनको ।
ऐसा क्या हुआ, फिजा-ऐ-मिजाज़ ही बदल गया पल में ।
बन रांझे की हीर अच्छी लगने लगी जमाने कि जलालत उनको।।



डी. के. निवातिया

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