मुक्तक · Reading time: 1 minute

रहे हम बन्द तालों में,चले गम फिर भी आते हैं

रहे हम बन्द तालों में,चले गम फिर भी आते हैं
किरण उम्मीद की लेकिन , वो अपने साथ लाते हैं
ये जीवन एक सिक्के सा, ख़ुशी गम जिसके दो पहलू
नहीं वो डगमगाते हैं ये सच जो जान जाते हैं

डॉ अर्चना गुप्ता

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