रहे ना मन फिर प्यासा(कुंडलिया छंद)

प्यासा मन यश का हुआ,नोटंकी की टेक।
फ़ोटो का बस शौक़ है,काम बने ना एक।।

काम बने ना एक,चलन हुआ अरे कैसा।
नारे भाषण ख़ूब,करे नहीं कहें जैसा।

प्रीतम की सुन बात,यथार्थ का पकड़ पासा।
सच का जल हो एक,रहे ना मन फिर प्यासा।

“औरत होती ओज”

औरत होती ओज की,मूर्ति देखो यार।
लुटती-पिटती रोज है,फिर भी ममता धार।।

फिर भी ममता धार,करो मान तुम हमेशा।
इसके बिन तुम गौण,सच्चा यही संदेशा।

प्रीतम की सुन बात,निष्काम बने शोहरत।
जब तक देती साथ,नहीं तुम्हारा औरत।।

“औरत का हथियार-आँसू”

रोके-रोके साँच को,औरत का हथियार।
आँसू देखो ख़ूब है,इसके सब लाचार।।

इसके सब लाचार,कानून भी हो लूला।
बनावट बने साख,सच लगे जलके भूला।

प्रीतम की सुन बात,आते झूठ के झोंके।
सच्चाई लाचार,कैसे ज़ुर्म को रोके।

राधेयश्याम बंगालिया “प्रीतम”
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