मुक्तक · Reading time: 1 minute

*रहमत*

छाया है इक समां सुहाना 
आया लब पर एक तराना 
हँसवाहिनी की रहमत से 
पाया है अनमोल खज़ाना

*धर्मेन्द्र अरोड़ा*

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