रहमत से भरपूर ,खुदा की नेमत हैं

रहमत से भरपूर,खुदा की नेमत हैं “ये बेटियाँ”
——————————-
जब भी गुड्डे गुड्डीओं के खेल में
अपनी गुड़िया को मैने डोली में बिठाया था
उसका हाथ बड़े प्यार से गुड्डे को थमाया था
नम हो आई थी मेरी आँखें भी
तब यह मन ना समझ पाया था 
क्यों?
उस बेजान गुड़िया के लिए तब मेरा दिल रोया था
जिसे ना मैने पाला था,ना जिसका बीज बोया था
फिर कैसे?
अधखिली कली को खिलने से पहले ही कुचल डालते हैं
अगर भूल से खिल जाए तो घृणा से उसे पालते हैं
आख़िर क्यों?
माँ को ही सहना पड़ता हमेशा अपमान है
बेटी हो या बेटा यह तो बाप का योगदान है
अगर 
‘भ्रूण हत्या’ को रोककर  ‘बेटी’ नहीं बचाओगे 
तो ‘बेटा’ पैदा करने को ‘बहु’ कहाँ से लाओगे 
इसलिए
शादी का लड्डू जो ना खा पाए वो तरसेंगे
जब बेटी रूपी नेमत के फूल ना बरसेंगे
तब
कहाँ से लाओगे दुल्हन जो पिया मन भाए
जो हैं नखरे वाले सब कंवारे ही रह जाएँ
लो कसम
यह कलंक समाज से आज ही हटाना है
बेटी को बचाना है,बस बेटी को बचाना है

This is a competition entry

Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "बेटियाँ"

Voting is over for this competition.

Votes received: 90

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग द्वारा अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें सिर्फ ₹ 11,800/- रुपये में, जिसमें शामिल है-

  • 50 लेखक प्रतियाँ
  • बेहतरीन कवर डिज़ाइन
  • उच्च गुणवत्ता की प्रिंटिंग
  • Amazon, Flipkart पर पुस्तक की पूरे भारत में असीमित उपलब्धता
  • कम मूल्य पर लेखक प्रतियाँ मंगवाने की lifetime सुविधा
  • रॉयल्टी का मासिक भुगतान

अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- https://publish.sahityapedia.com/pricing

या हमें इस नंबर पर काल या Whatsapp करें- 9618066119

Like Comment 0
Views 414

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share