रहमतें

हँसी खुशी चल रही थी जिन्दगी
फिर वो काली रात आ गयी
नींव ही खुदी थी आशियाने की
भारी आँधी बरसात आ गयी
कोसते रहे इस मौसम को हम
मन में भीगने की बात आ गयी
भीगने निकले ही थे बाहर घर से
धूप भी हमारे ही साथ आ गयी
हर तरह खुद को ढाल लिया हमने
तोड़ने हर बार कायनात आ गयी

“सन्दीप कुमार “

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3 साझा पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं | दो हाइकू पुस्तक है "साझा नभ का कोना"...
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