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रस्म-ए-मोहब्बत

रस्म-ऐ-मोहब्बत

हम रस्में मोहब्बत को ऐसे अदा किए ।
दुनिया ने दिए जख्म हम तो मुस्कुरा दिए।।

इजहारे मोहब्बत करें चाहा बहुत मगर।
तेरे गुरुर ने लवों पे ताले लगा दिए।।

हमने तो मोहब्बत को इबादत बना लिया।
नक्शे कदम तेरे जहां सजदे वहां किए ।।

अब ऐ भी गवारा नहीं दीदार कर सकें ।
चिलमन खुली थी आपने पर्दे गिरा दिए।।

खुशबू से महकता रहे अब ये तेरा दामन।
सब फूल तोड़कर तेरे दामन में देभर दिये।।

परवानों का अंजाम तो जल जाना है ‘ *अनीश*’।
ताज्जुब की बात क्या है अगर हम मिटा दिए।।

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Anis Shah
Anis Shah
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