रचना का उद्देश्य:-*आत्म-जागृति*

*सोचा कुछ विषय दोहन करें,
इस तन मन धन पर विचार करें,
बहस करें विवेक जगे,

विषय हो धर्म वा राजनीति,
भाषा-संभाषा करने को,
उपयुक्त उत्तर नहीं बचा हो पास में,

अब क्यों न कुर्सी उठाकर वार करें ?
याद किए कुछ श्लोक दोहे चौपाई रमैणी संवैया क्यों न इनको पेश करें,

ये कैसा जमाना है,
खुद का नहीं कुछ पास में,
अंध-अनुकरण,अंध-श्रृंगार है पास में,

खुले कैसे वेद-शास्त्र,
चाबी नहीं है साथ में,
सुध-बुध नहीं है पास में,

शरण खुद की ही भली,
आतम चेतन हो आधार,
सवत: सब बंद द्वार खुल सके !

विशेष:-
“रचना का उद्देश्य”-“आत्म-जागृति”
विवेक जगने और जगाने तक ही बुद्धो की शरण की प्रेरणा का औचित्य समझाना,
अपने विवेक की डोर किसी के हाथ में न दे,
जीते जी मुक्त होने के लिए अति-आवश्यक,
असल में आपकी चेतना ही
आपका गुरु
आज नहीं तो कल हो जा शुरू, परमहिताय..परमसुखाय,

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