Feb 20, 2020 · कविता
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रंग रंगीला फागुन

रंग रंगीला फागुन बहारें ले कर आ गया।
संतरगी रंगों की फुहारें ले कर आ गया।

न करना बरजोरी सुन ओ सांवरे कन्हैया
कहीं मुड़ न जाए प्यारी राधे की कलइयां
राधा संग कान्हा की तकरारें लेकर आ गया
संतरगी रंगों की फुहारें ले कर आ गया।

आया मौसम मस्त मगन एक दूजे को मनाने का
रूठे और कुछ खफ़ा-खफ़ा मनमीतों को रिझाने का
अपनों के संग मीठी मनुहारें लेकर आ गया
संतरगी रंगों की फुहारें ले कर आ गया।

भूलो बैर को धो डालो सब अपने मन के मैल को
तन और मन को रंग डालो स्नेह के इस खेल में
फाग के गीतों की झनकारें ले कर आ गया।
संतरगी रंगों की फुहारें ले कर आ गया।

रंग रंगीला फागुन बहारें ले कर आ गया।
संतरगी रंगों की फुहारें ले कर आ गया।

रंजना माथुर
अजमेर (राजस्थान )
मेरी स्व रचित व मौलिक रचना
©

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Ranjana Mathur
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भारत संचार निगम लिमिटेड से रिटायर्ड ओ एस। वर्तमान में अजमेर में निवास। प्रारंभ से... View full profile
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