कविता · Reading time: 1 minute

रंग दिखलाऊँ अब कौन सा

रंग दिखलाऊँ अब कौन सा
दर्शाएगा जो मेरी छवि को
भड़कीला ज्यादा ना लगे जो
भा जाए हर एक किसी को

रंग कहूँ सूरज सा मुझको
भाता है रातों मे तो क्या
कहूँ जो धोया काला रंग
दौड़ता है दिन मे तो क्या

सच तो है एक रेखा पीली सी
भाती है दिन रात कवि को
रंग दिखलाऊँ अब कौन सा
दर्शाएगा जो मेरी छवि को

हरा रंग दूँ पत्ती से छिपकर
और कांटे चिड़ जाए तो क्या
चुनूँ भूरा जो मिट्टी से लड़कर
नदी बुरा फिर माने तो क्या

है सत्य वही बस एक रंग
रोशन करता जो प्रीति को
रंग दिखलाऊँ अब कौन सा
दर्शाएगा जो मेरी छवि को

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