रंग गुलाल मोहे पिया लगावैं

रंग गुलाल मोहे पिया लगावैं
लपकि-झपकि मोहे अंग लगावैं
मैं उन पर जाऊँ वारी
भरि पिचकारी मोहे मारी
तन भी भीगौ
मन भी भीगौ
अँखियन-अँखियन महिं मोहि लखावैं
रंग गुलाल मोहे पिया लगावैं ।

पिया संग होरी खेलन कौ
यह प्रथमो अवसर मोहि प्राप्ति भयो
तन मेरो रंग-गुलाल से सराबोर भयो
जीवन कौ ऐसो समय
न कबहूँ मोहि दीदार भयो
बैर भुलाय, सवै गले लगावैं
दौड़ि-दौड़ि कै रंग लगावैं
रंग गुलाल मोहे पिया लगावैं ।

वो गली सै सरपट निकलीं
तिरछे नैनों से बात हुई
मोरे पिया की अँखियाँ चार भईं
पुराने रिश्तों की डोर जुड़ी
मोहिं समझन महिं न देर लगी
देखत-देखत महिं ही बुलबुल
गुलों पर निसार भई ।
जब लगा गुलाल गुलाबी गालों पर
मोरे पिया की पिय की
वाँछे खिल गईं
जब पिया को मिला चुम्बन का स्पर्श
मईं तौ शरम सै पानी-पानी हुई गई ।
अँखियन में मईं नीर भरे
फागुन की बदरी हुई गई
बार-बार मोहिं पिया मनावैं
दै चुम्बन मोहिं कंठ लगावैं
रंग गुलाल मोहे पिया लगावैं
रंग गुलाल मोहे पिया लगावैं ।।

– आनन्द कुमार

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