योद्धा नहीं सिर्फ वो (कविता)

योद्धा नहीं सिर्फ वो,
जो रणभूमि को जाते।
समाज में रहने वाले कब,
उनसे कम आंके जाते।
ना देखा युद्ध क्षेत्र कभी,
ना तलवार गही हाथ में।
दयानंद, शंकराचार्य,स्वामी विवेकानंद, गांधी,
जैसों की गिनती योद्धाओं में।
जो आये देश के काम,
लड़े सदा कुप्रथाओं से।
समाज हित कठिनाई सहते,
संघर्षरत अनीति, कुविचार से।
अस्त्र शस्त्र प्रहार होता सहज,
शत्रु पर युद्ध के मैदान में।
पर अपनो के चलन बदलना,
दुश्तर है कड़े व्यवहार में।
दहेज, मृत्यु भोज,मिलावट,
जैसी अनगिनत कुप्रथाएं है।
जो समाज में व्याप्त होकर,
सामाजिकता के लिए कलंक है।
बातों के शूरवीर होते बहुत,
पर निभाते समय हट जाते है।
कुरीतियों के खिलाफ डटना,
आत्मशक्ति सम्पंन योद्धा ही कर पाते है।
आज जरूरत पुनः देश को,
ऐसे वीर सपूतों की।
विचार क्रांति का शंखनाद करें,
चूलें हिलादे कुप्रथा
कुविचारों की।
(राजेश कुमार कौरव “सुमित्र”)

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