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ये हाल है हमारे आफिस का..

रीतेश माधव

रीतेश माधव

कविता

May 1, 2017

कोई काम के बोझ के तले,
बाकी पड़े है अवारा निठल्ला..
मचाते है शोर करते है हल्ला
ये हाल है हमारे आफिस का।

निठल्लों की फौज करते है मौज
व्यंग्य उलाहना और मीन मेख..
दूसरों का निकालते है हर रोज
ये हाल है हमारे आफिस का।

कर्मठ को मिले प्रताड़ना,हो शोषण
चापलूस चाटुकारों को मिलता ईनाम
मुँह-देखा काम होता….
ये हाल है हमारे ऑफिस का।

काम करने वाले कम,निठल्ले है ज्यादा
ऐश करते ये निठल्ले, काम करने वाला अभागा…
कोई बैठा रहता तो कोई भागा भागा
ये हाल है हमारे आफिस का।

प्रशासन की कुम्भकर्णी नींद खलती है
मानो निठल्लों को ऐश की मौन सहमति है
हद्द है अराजकता का…
ये हाल है हमारे आफिस का।

गजब का एकता है इन कामचोरों में
वीर है खूब, हो हल्ला मचाने में
काम ना किया कभी ना अब करेंगे
ये हाल है हमारे आफिस का।

आलोचना व्यंग्य और सीनाजोरी इनके शस्त्र
राजनीति षड्यंत्र और चापलूसी में दक्ष
ना आती लज्जा इन्हें ना आती शर्म
ये हाल है हमारे आफिस का।

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