ये वक़्त है ना

ये वक़्त है ना
किसी का ये सुनता कहाँ है
किसी के रुकने से रुकता कहाँ हैं
दिन, रात या सुबह और शाम
ठिठुरती हुई सर्दी या तपती गर्मी
उमड़ते बादल या बरसते मेघ
सब बस दुहराता चला जाता है
ये वक़्त किसी को याद नहीं होता
जिनके हक में जितना होगा
ये वक़्त उन्हें उतना देता है
किसी के हिस्से में गुमनामियाँ
तो किसी को शोहरत देता हैं
किसी के ज़िन्दगी का
वक़्त कोई मोल नही देता
तो किसी को अपनी तारीख ही दे देता है
ये वक़्त किसी को तोड़ जाता है
तो किसी की ज़िंदगी को मोड़ जाता है
ये वक़्त है ना
बचपन को यौवन और यौवन को
बुढापा दे जाता है
किसी को किसी का यार बना जाता है
किसी से नफरत भी करवा देता है
ये वक़्त किसी को सबक
तो किसी को जीने का तरीका सीखा जाता है
कितना मुश्किल है इसका हिसाब करना
अगर रुक जाए तो
वक़्त हाथ से फिसलता चला जाता है
बड़ा ही स्वार्थी मिजाज है इसका
ये बस अपनी धुन में गुनगुनाता रह जाता है-अभिषेक राजहंस

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