कविता · Reading time: 1 minute

ये रिश्ते…

औपचारिकता की चकाचौंध में
है एक अजीब सा आकर्षण
जिसके वशीभूत होकर
मैं भी सोचती रही
क्यों हूं मैं ऐसी
स्पष्ट और खरी सी।
क्यों नहीं ओढ़ पाती ..?
औपचारिकता का आवरण
कई बार कोशिश करती रही
इस मखमली चादर को ओढ़ने की
लेकिन बार-बार फिसल जाती
ये स्पष्टता के पहाड़ से।
ये व्यक्तित्व का आईना भी
साथ नही निभा पाता
इस औपचारिकता के रिश्ते में
दिल और दिमाग में चलती
अजीब सी एक खींचतान
जिसका स्पष्ट प्रतिबिंब दिखता
मेरे चेहरे के दर्पण पर।
नाकाम सी इस कोशिश से
कह देती फिर अलविदा…
बेशकीमती मिले जो भी
रिश्तों के अनमोल मोती मुझे
सहेज लेती उन्हें मन के दर्पण में
फिर करती गहरा सा चिंतन।
सीमित ही सही …
पर अहसासों के रिश्ते हों
विशाल सागर के गर्भ में भी
कुछ ही बेशकीमती मोती होते हैं
जैसे भीड़ में कुछ अनमोल रिश्ते
ये अनमोल रिश्तों के मोती
हमें बांधे रखते एक अटूट रिश्ते में
इन पाक रिश्तों से निखर जाता
मेरे चेहरे का स्पष्ट दर्पण…..।

कमला शर्मा

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