May 4, 2021 · कविता
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ये बेतुकी भीड़

मैं बद से बद्तर होता चला गया।
कभी सोचा न था कि भलाई के बदले बुरा होगा।
मैं बुराई के बदले को टालते चले गया।
कब? चमकेगी किस्मत मेरी।
रोशनी के इंतजार में ठगा सा चला गया।
चमकने बालो की किस्मत से भी रगड़ के देखा मैंने।
फिर भी किस्मत बालो से जुदा होता चला गया।
चमकते हुए देखा बहुत सितारों को ।
बो भी एक दिनबुझता हुआ चला गया।
मैं भीड़ का हिस्सा नही बन सका।
इसलिए इस बेतुकी भीड़ से अकेला होता चला गया।

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Phoolchandra Rajak
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Li.g.86.ayodhoya.nagar.bhopal.pin..462041 फूलचद रजक कवि एवं साहित्यकार विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं लेखन, कविता कहानी एवं लेख विगत बीस... View full profile
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