ये बनिहारिने...

धान रोपने जाती
बनिहारिनों की कतारें
भींगतीं जातीं, गाती जातीं
गीत….जो बरसो से है
उनके होंटों पर
ओर हर साल की बारिश में
मचल उठते है ये गीत
और गूंजता हैं गांव
बारिश की धुनों के साथ
बनिहारिनों के इन गीतों से
जिनमें सुर के साथ
मान मनुहार और कुछ
नमकीन, खट्टी झड़प
जिन पर अक्सर
खिलखिला उठती ये बनिहारिने,
मैं अपने घर में बैठी
सुनती हूँ अक्सर जाती हुई,
गाती हुई बनिहारिनों के
ये मधुर आंचलिक गीत
जो कितना मधुर, सुरीला
बरखा का छनकता गीत
ये बनिहारिने अगर न समोती
अपनी संस्कृति तो ,
कितनी सूनी होती बारिश
कितने वीराने होते खेत,
मेरे गांव की ये बनिहारिने
जैसे जान डाल देती हैं
बारिश को और शीतल
और मधुर बनाने को
ये बनिहारिने…

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