कविता · Reading time: 2 minutes

ये दुनिया सिर्फ़ काम ही देखती !

ये दुनिया सिर्फ़ काम ही देखती !
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ये दुनिया सिर्फ़ काम ही देखती !
चाहे दोस्त हो या रिश्तेदार हो ,
घर हो या अपना परिवार हो ,
स्कूल, काॅलेज या कार्यालय हो ,
हर जगह बस, एक ही मांग होती !
ये दुनिया सिर्फ़ काम ही देखती !!

स्वार्थ वश ही जीवित कोई रिश्ता है ,
यह तो बस , स्वार्थ की पराकाष्ठा है ,
इसमें घर-परिवार का स्वार्थ छुपा है ,
रिश्तों का मर्म अब कुछ नहीं बचा है ,
हर जगह बस, एक ही मांग होती !
ये दुनिया सिर्फ़ काम ही देखती ! !

दोस्ती का आधार भी अब स्वार्थ हुआ करते ,
बिन इसके ना कोई दोस्त ना यार हुआ करते ,
स्वार्थ के इर्द-गिर्द ही सबके संसार हुआ करते ,
स्वार्थ सिद्धि के लिए ही अब प्यार हुआ करते !
क्यूॅं ना कहें कि हर जगह बस, एक ही मांग होती !
आज के युग में ये दुनिया, सिर्फ काम ही देखती ! !

जब हम सब किसी स्कूल काॅलेज में हैं पढ़ते ,
तो सभी शिक्षक उन्हें ही ज़्यादा प्यार करते ,
जो उन शिक्षकों की अपेक्षाओं पे खड़े उतरते ,
जब तक सारे होम – वर्क हम पूरे करते रहते ,
तब तक ही हम मान-सम्मान के हक़दार होते ,
जब हम शिक्षकों के बातों की अवहेलना करते ,
तो सदा ही उनके कोपभाजन बनकर रहते ,
और जब उनकी सारी अपेक्षाएं पूरी कर देते ,
तो उनके सबसे बड़े विश्वासपात्र बनकर रहते ,
स्पष्ट हैं कि हर जगह बस, एक ही मांग होती !
ज्ञान अर्जन में ये दुनिया,सिर्फ़ काम ही देखती !!

किसी कार्यालय में भी ऐसी ही स्थिति होती ,
बस कार्य ही कार्य करने की संस्कृति होती ,
जिनकी संचिकाओं में ज़्यादा कार्य हो पाती ,
बस, उनकी ही कोई ख़ास पहचान बन पाती ,
चूंकि कार्यालय जनता की सेवा के लिए होते ,
अत: कार्य निष्पादन तो यहाॅं आवश्यक ही होते ,
वज़ह जो भी हो हर जगह बस,एक ही मांग होती !
ये काम की प्यारी दुनिया, सिर्फ़ काम ही देखती ! !

घर से भी वास्ता किसी का तब तक ही होता ,
जब तक परिवार की सारी जरूरतें पूरी करते ,
जरूरतें जब पूरी नहीं होती तो रिश्तों में दरार पड़ते ,
ऐसा प्रतीत होता है कि ये रिश्ता स्वार्थ वश ही होते ,
जब तक काम करते तब तक ही अपने बने रहते ,
वक्त पे पैसे की जुगाड़़ ना हो तो भूचाल आ जाते ,
वज़ह जो भी हो हर जगह बस, एक ही मांग होती !
अति स्वार्थ से भरी ये दुनिया,सिर्फ़ काम ही देखती !!

स्वरचित एवं मौलिक ।

अजित कुमार “कर्ण” ✍️✍️
किशनगंज ( बिहार )
दिनांक : 02-08-2021.
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