** ये दिल हुआ ना कभी अपना **

ये दिल हुआ ना कभी अपना
हुआ पराया होकर भी अपना
खायी ज़ालिम जमाने की ठोकर
दर-दर डर-डर आपा खो कर
ये दिल की लगी है नही दिल्लगी
मंजर इश्क-ए-तूफां कब रुकेगा
निगाहों से आकर दिल में बसी
फिर भी आँखों में नमी सी है
ना जाने दिल में कमी सी है
ख्यालों में अब क्यूं बसी सी है
ये दिल हुआ ना कभी पराया
हुआ पराया होकर भी अपना।।
दर्द हुआ ऐसा सीने में जैसे ख़ंजर
दिल चीर के देख ले मेरा -अपना
ये दिल हुआ ना कभी अपना
हुआ पराया होकर भी अपना ।।

?मधुप बैरागी

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