गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

ये तो है खंजर मियान थोड़ी है

कई है मुल्क मगर उनमें शान थोड़ी है
कोई भी हिन्द के जैसा महान थोड़ी है
?
हजार फूल की खुश्बू से मुअत्तर है ये
ये कोई उजड़ा हुआ गुलसितान थोड़ी है
?
वतन के वास्ते ये जान— भी लुटाते हैं
यहां जियालों की ऐसे बखान थोड़ी है
?

यहां तो प्यार का बदला मिले मुहब्बत से
ये सौदा आपसी है ये लगान थोड़ी है
?
ये मानता हूं तेरी खाहिशें हैं ऊंची पर
छुएगा आसमां इतनी उड़ान थोड़ी है
?

डरे किसी से न हो हाथ मे कलम जिसके
ये तो है खंजर खाली मियान थोड़ी है
?
बताओ प्रीतम तुमको बसाएं क्यों दिल में
ये तो है रब का मेरा मकान थोड़ी है
प्रीतम राठौर भिनगाई
श्रावस्ती (उ० प्र०)

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